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आओ हमारे आस पास की आक्सीजन को सहेजें

आओ हमारे आस पास की आक्सीजन को सहेजें

आप पूरा विश्व कोरोना नाम की महामारी से जूझ रहा है, कोई स्थायी इलाज नजर नही आ रहा है सारे के सारे अस्पताल मरीजों से भरे नजर आ रहे हैं एक डर का माहौल हर तरफ नजर आ रहा है

प्रकृति का अत्याधिक दोहन , प्रकृति से खिलवाड़ मनुष्य का पुराना खेल रहा हैं अतः आपदाएं तो आएंगी ही…
पर्यावरण को नष्ट करने से लेकर जल का अत्यधिक दोहन , प्रदूषण फैलाना, ग्लोबल वार्मिंग की समस्या, जमीन की उर्वरा शक्ति को समाप्त करने ये वो काम है जो पृथ्वी व पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंचा रहे हैं !
विकास की अंधी दौड़ में इंसान यह भूल गया कि इसके दुष्परिणाम क्या होंगे
सतत सिलसिला लगातार जारी है
अब भी समय है हम चेत जाएं
पर्यावरण व जल संरक्षण को संरक्षित कर आने वाली पीढ़ी के अच्छे जीवन के लिए एक रास्ता तैयार करें
आज आवश्यकता है हम अधिक से अधिक पेड़ लगाए, वीरान जगह को जंगल के रूप में विकसित करें ऐसा करने से शुद्ध आक्सीजन के साथ साथ हम वन्य जीवों का भी संरक्षण का काम आसानी से कर पाएंगे
वन्य क्षेत्र में अनेक तरह के जीव पनपेंगे तो पेड़ और जीव एक दूसरे को अपने आप बढाते रहेंगे
वन्य क्षेत्र बढ़ने से वर्षा भी बढ़ेगी जो सबके लिए लाभकारी होगी, वर्षा बढ़ने से जल की उपलब्धता बढ़ेगी, जल की उपलब्धता से उद्योगों को भी बढ़ावा मिलेगा !
इस तरीके से यह सब करना मानव जाति की भलाई का कार्य ही माना जाएगा !
फिर देरी किस बात की आओ आने वाली पीढ़ी के लिए आक्सीजन सहेजे!

बिश्नोई धर्म के प्रवर्तक गुरु जम्भेश्वर जी ने सैंकड़ो साल पहले बताया था बिना पर्यावरण संरक्षण के प्रकृति का संतुलन बनाये रखना असंभव है

बिश्नोई धर्म के प्रवर्तक गुरु जम्भेश्वर जी ने उस वक्त भविष्य में आने वाले खतरे को भांपते हुए लोगो को पेड़ों और जीव मात्र की रक्षा का पाठ पढ़ाया था, क्योंकि बिना पर्यावरण संरक्षण के प्रकृति का संतुलन बनाये रखना असंभव है। इस तरह के संदेश देने वाले गुरु जमभेश्वर जी विश्व के पहली महान विभूति थे। आज गुरु महाराज के बताए पथ का अनुसरण बिश्नोई समाज के साथ साथ सभी लोग कर रहे है। उन्होंने कहा कि जल, जंगल व जमीन के आपसी सामंजस्य से ही प्रकृति का सरक्षण होता है प्रकृति बढ़ती है, जब जब इनका सामंजस्य बिगड़ा तब तब मनुष्य के साथ साथ वन्य जीवों पर प्रकृति की मार पड़ी। आज संसार का हर व्यक्ति ग्लोबल वार्मिंग से होने वाले खतरों से चिंतित है, परन्तु चिन्तन गुरु जम्भेश्वर महाराज ने तो सैंकड़ों वर्ष पहले ही जनता को इससे आगाह कर दिया था।
आज आवश्यकता है ऐसे पर्यावरण प्रेरक धर्म गुरुओं की सीख का अनुसरण किया जाए, अपने जीवन व कार्यप्रणाली में इन कार्यो को आत्मसात किया जाए ताकि मानव मात्र को कोरोना जैसी महामारी व अन्य आपदाओं का सामना न करना पड़े !
आवश्यकता है एक संकल्प की, एक दर्द निश्चय की !
आओ सब मिलकर पर्यावरण व जल संरक्षण के लिए रोज कुछ वक्त निकालें !

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