Home साहित्य बिन तेरे कैसे जी लूंगा *देख प्रकृति का ये मंज़र... सिने मे...

बिन तेरे कैसे जी लूंगा *देख प्रकृति का ये मंज़र… सिने मे चले मेरे ये खंज़र…

………..
देख प्रकृति का ये मंज़र…
सिने मे चले मेरे ये खंज़र…
मन को बहलाया…
तन को सहलाया…
तो हर घाव से मै कहराया…
डर था वो ही बात हुई….
कैसे कटेगी रात. .अमावस्या…
ये सोच- सोच मै थर्राया….
क्या कमी रही…..
मेरे कर्म मे , मेरे प्रेम मे…
क्यों दिखलाये मुझै ख्वाब…
क्यों सपनो के महल बनवाये….
हे खुदा…..
तू भी रोया होगा…?
या दिल तेरा पत्थर होया होगा….
मुड़कर देख…. फिर देख…
तेरे अपनो ने ….
क्या-क्या खोया होगा….
मुझै पता है …
तू नही देख पायेंगा….
रोते अपनो को…
टूटते सपनो को…
मै ! बेबस लाचार हुआ…
क्या यहीं मेरा गुनाह हुआ..
हर दर्द सह लूंगा..
हर गम पी लूंगा..
पर तेरे बिन कैसे जी लूंगा
बतलाऊँ दर्द किसे…?
दिखाऊँ जख्म किसे…?
तेरे ही संग खेलू मै…
तू कहे तो हंसू या रो लू मै…
पर बिन तेरे कैसे जी लू मै….
वो आयेंगे …?
जख्म मेरा सहलायेंगे…
हाथ रखेगें वहीं जहाँ जख्म गहरा है…
क्या खुशी , अब तो गम पर भी पहरा है..
नही चाहिए किसी की हमदर्दी..
बस तेरा ही सहारा है..।
हाथ थाम सको तो थाम लो…
नही तो ये किसान बेसहारा है …
मै उठूंगा, चलूंगा, दौडूंगा ….
हर तुफां से लड़ जाऊँगा…
तू हाथ मेरा थामे रखना…
तू लाख दे गम , सह लूंगा…
तू ही बता बिन तेरे कैसे जी लूंगा..।।
……
राकेश कुमार ^राकेश^
भादरा हनुमानगढ़
( किसानों को समर्पित)

 

RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Most Popular

Recent Comments